नमस्कार दोस्तों, एक बार फिर से आपका स्वागत करते हैं हम। आज हम आपको नाॅलेज का एक साॅलिड डोज देंगे अपने इस आर्टिकल के माध्यम से। जैसा कि आप जानते हैं भारत में अनेक प्रकार के उत्सव और परंपराएं मनाइ जाती हैं। यही कारण है कि भारत को विविधताओं का देश कहा जाता है। हमारे देश में रहने वाले लोग अपनी परंपराओं के बल पर अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं। परंपराएं एक दिन में नहीं बनती। यह तो वर्षों पुरानी होती हैं जिन्हें लोग मनाते आते हैं। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कुछ ऐसी ही अजीबो गरीब परंपराओं के बारे में जिन्हें जानकर आपका सर चकरा जाएगा। तो चलिए शुरू करते हैं।

लड़की की लड़की से शादी: दोस्तों, आपने अकसर देखा होगा कि जब भी शादी होती है तो दूल्हा घोड़ी पर चढ़कर जाता है और दुल्हन को अपने साथ धूमधाम से लेकर आता है। आगे आगे दूल्हा, पीछे-पीछे नाचते गाते बाराती। 

यह नजारा आपने लगभग हर शादी में देखा होगा। लेकिन क्या आपको मालूम है कि भारत में एक ऐसी जगह भी है जहां पर दूल्हा घोड़ी पर चढ़कर नहीं आता है दुल्हन को लेने। चलिए आपको विस्तार से बताते हैं। गुजरात का एक गांव ऐसा भी है जहां पर बहुत सारे आदीवासी लोग रहते हैं। इन लोगों की परंपरा बड़ी अनोखी है।

यह गांव है गुजरात के छोटा उदयपुर जिले में जहां यह रिवाज है कि यहां लड़के से नहीं बल्कि लड़की से दुल्हन की शादी कराई जाती है। यहां घोड़ी पर दूल्हे की बहन चढ़ती है। वह बारात लेकर दुल्हन के घर जाती है और फिर दुल्हन को अपने साथ लाकर अपने भाई को सौंप देती है। हैरानी की बात यह है कि जब दुल्हन घर आ जाती है तो दूल्हे के साथ शादी की सारी रसमें फिर से की जाती हैं जैसे जय माला डालना, हल्दी की रसम, यहां तक कि फेरे भी होते हैं। इस गांव में शादी की एक अनोखी शर्त भी रखी जाती है कि जो बहन घोड़ी चढ़कर दुल्हन को लेने जा रही है उसका कुंवारा होना जरूरी है। अगर वह कुंवारी नहीं है या दूल्हे की कोई सगी बहन नहीं है तो मामा, चाया या अन्य रिश्तों से कुंवारी बहन को घोड़ी पर बिठाकर बारात के साथ भेजा जाता है। तब तक दूल्हा अपनी दुल्हन का घर पर ही इंतजार करता है। दूल्हें को घोड़ी पर जाने से इसलिए मना किया जाता है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि अगर दूल्हा अपनी दुल्हन को लेने के लिए घोड़ी पर चढ़कर जाएगा और मंडप में बैठेगा तो यह अशुभ होगा। यह भी माना जाता है कि इससे दूल्हे को दांपत्य जीवन का सुख नहीं मिल पाता। साथ ही उसका वंश भी नहीं बढ़ पाता है। इस परंपरा के बारे में जानकर आपको कैसा लगा हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

बच्चों को छत से नीचे फेंकना: दोस्तों, सुनने में जितनी अजीब ये परंपरा है उतनी ही अजीब इस परंपरा के पीछे की कहानी है। दरअसल यह परंपरा है महाराष्ट्र के शोलापुर गांव की। कहा जाता है कि यहां पर एक बाबा की दरगाह है जिनका नाम है उमर। ये दरगाह करीब 700 वर्ष पुरानी बताई जाती है। इसी दरगाह के पास बच्चों को छत से फेंका जाता है जिसे देखने के लिए हजारों की संख्या में लोग यहां जमा होते हैं। इसके पीछे लोगों का तर्क यह है कि इससे बच्चे को आशीर्वाद मिलता है और वो हमेशा स्वस्थ रहता है। इसके साथ ही बच्चे के परिवार का भाग्य भी उदय होता है। इस परंपरा को हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्म के लोग निभाते हैं और अपने बच्चों को उंचाई से फेंकने यहां पर आते हैं। आपको बता दें कि यहां पर बच्चों को करीब 30 से 50 फिट की उंचाई से फेंका जात है। इसके बाद नीचे कुछ लोग कम्बल लेकर खड़े रहते हैं जिसमें बच्चे को गिरने के बाद झूला झुलाया जाता है। ऐसे दम्पत्ति जिनको लंबे समय के बाद पहली संतान हुई है उनके बच्चों को यहां पर उंचाई से फेंका जाता है। यह अकेला राज्य नहीं है जहां ऐसी परंपरा है। कर्नाटक के इंडी में संतेश्वर मंदिर में भी ऐसी परंपरा बरसों से चली आ रही है। इस प्रकार की परंपरा के पीछे कितनी बातें सच है यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन ऐसी परंपरा बच्चों के लिए खतरनाक भी साबित हो सकती है। उंचाई से गिरने पर उनकी जान भी जा सकती है। आप इस बारे में क्या सोचते हैं यह सच है या अंधविश्वास? हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

यहां होती है मेंढ़कों की शादी: हम जानते हैं आपको यह जानकर अजीब लग रहा होगा। मगर यह सच है। दरअसल भारत में कई राज्य ऐसे हैं जहां पर बहुत ही कम बारिश होती है। यही नहीं, यहां पर गर्मी का स्तर भी बहुत अधिक रहता है। यही कारण है कि इन इलाकों में लोग बारिश के लिए तरसते हैं। भारत के जमशेदपुर और नागपुर ऐसे शहर हैं जहां पर इंद्रदेवता को प्रसन्न करने के लिए मेंढकों की शादी करवाई जाती है। बता दें कि यहां के स्थानीय लोगों ने एक प्रथा शुरू की है जिसके तहत अलग अलग तालाबों से दो मेंढकों को पकड़ कर लाया जाता है। इसके बाद एक मंदिर में ले जाकर पूरे धूमधाम और रीतिरिवाजों के साथ इन मेंढकों की शादी करवाई जाती है। यहां के लोगों का मानना है कि ऐसा करने से इंद्र भगवान बहुत खुश होते हैं और यहां खूब बारिश होती है। शादी होने के बाद इन मेंढकों को एक ही तालाब में छोड़ दिया जाता है। यहां के लोग ऐसा मानते हैं कि मेंढक भगवान इंद्र के बहुत बड़े भक्त होते हैं। अगर इनको प्रसन्न कर लिया तो इंद्रदेव भी प्रसन्न हो जाएंगे और फिर यहां के लोगों को गर्मी से राहत मिलेगी। इसी कारण यह प्रथा शुरू हुई है। इसी से जुड़ा एक और किस्सा है। वर्ष 2019 में भारत के किसी गांव में बहुत कम बारिश हो रही थी और लोगों ने इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए मंेढक और मेंढकी की शादी करवाई। इसके कुछ समय बाद ही यहां पर इतनी बारिश हुई कि बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो गई। गांव के हजारों घरों को इससे नुकसान पहुंचा था। इसीलिए दो महीने बाद उन मेंढकों का तलाक करवाना पड़ा। वैसे आपकी इसके बारे में क्या राय है हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

कुत्तों से शादी कराना: अब जो बात हम आपको बताने जा रहे हैं वो बेहद चैंकाने वाली है। चलिए यहां तक तो ठीक था कि मेंढकों की शादी करवा दी जाए, लेकिन ये क्या फितूर हुआ भला, कि एक कुत्ते और इंसान की शादी करवा दी जाए। सुनने में अजीब लग रहा है न। लेकिन क्या करें। ये बिलकुल सच है। यह प्रथा 21वीं सदी में भी लोगों के बीच मौजूद है। दरअसल झारखण्ड के कई शहरों में ऐसी परंपरा आज भी कायम है। ऐसे माता-पिता जिनकी बेटियों पर भूत-प्रेत या अन्य किसी का साया होता है, वे यहां पर अपनी बेटियों को लेकर आते हैं और उनकी कुत्ते से बड़ी धूमधाम से शादी करवाते हैं। अब इसे आप चाहे विश्वास कहें या अंधविश्वास, लेकिन यहां के स्थानीय लोगों की ऐसी मान्यता है कि अगर ऐसी बेटियों की जिनपर भूत बाधा है उनकी शादी कुत्ते से हो गई तो उनका भूत उन्हें छोड़कर कुत्ते के शरीर में प्रवेश कर जाता है। इतना ही नहीं, यहां पर तो पुरुष भी भूत भगाने के लिए कुतिया से शादी करने आते हैं। बकायदा इस शादी में सारी रसमों को भी निभाया जाता है और खाने का कार्यक्रम भी रखा जाता है। इसमें सभी रिश्तेदार और नातेदार शामिल होते हैं।

सिर से नारियल फोड़ना: दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडू के करूर जिले में हर वर्ष हजारों की संख्या में लोग महालक्ष्मी मंदिर में आकर सर से नारियल फोड़ते हैं। इनमें बुजुर्ग और यहां तक कि बच्चे भी शामिल होते हैं। चलिए अब यहां की इस प्रथा के बारे में प्रचलित कहानी जान लेते हैं। एक बार की बात है, अंग्रेज यहां इस मंदिर को तोड़कर रेलवे ट्रैक बनवाना चाहते थे। प्राचीन मंदिर को सुरक्षित रखने के लिए और अंग्रेजों से बचाने के लिए ग्रामीणों ने इसका विरोध किया। अंग्रेज भी तो किसी चालाक लोमड़ी से कम नहीं थे। शर्त रख दी कि अगर आप सब चाहते हैं हम यह मंदिर न तोड़े तो यहां मौजूद पत्थरों को आपको अपने सर से फोड़ना होगा। अगर आपने ऐसा कर दिया तो हम यहां पर रेलवे ट्रैक नहीं बनाएंगे। ऐसा कहते हैं कि तब गांव वालों ने देवी मां का नाम लिया और अपनी जान की परवाह न करते हुए उन सभी पत्थरों को अपने सिर से फोड़ दिया। देवी मां के प्रभाव से उनमें से किसी को भी कोई चोट नहीं आई। इस अजूबे को देखने के बाद अंग्रेजों की आंखें फटी की फटी रह गईं। वे वहां से चले गए और रेलवे ट्रैक बनाने का विचार दिल से निकाल दिया। तभी से यह परंपरा चल पड़ी। बस फर्क इतना है कि उस वक्त गांव वालों ने पत्थर फोड़े थे और आज नारियल अपने सर से फोड़कर ये परंपरा निभाई जाती है। महज कुछ ही मिनटों में ये काम पूरा हो जाता है। हालांकि कुछ लोगों को इसमें चोट लगती है, दर्द भी होता है लेकिन वह लोग सब सह जाते हैं। इसके बाद नारियल को भगवान को चढ़ाया जाता है।

गायों के पैरों में लेटना: दोस्तों, चलिए अब आपको मध्यप्रदेश की सैर कराते हैं। आपने अकसर सुना होगा कि दीवाली के बाद पूरे भारत में गोवरधन पूजा की जाती है। लेकिन आप में से कितने लोगों को ये पता है कि एक ऐसा स्थान भी है जहां पर गोवर्धन पूजा के बाद गायों के नीचे लेटने की प्रथा है। हमें कमेंट करके बताएं। दरअसल, यहां के स्थानीय लोगों द्वारा ऐसा माना जाता है कि दौड़ती हुई गायों या बैलों के नीचे लेटने से उनके मन की मुराद पूरी होती है। मान्यता यह भी है कि ऐसा करने से उन्हें गौमाता का आशीर्वाद मिलता है और उनके जीवन में खुशहाली आती है। हालांकि बहुत से लोग इन गायों के नीचे दब कर गंभीर रूप से घायल भी हो जाते हैं। फिर भी वो लोग इस प्रथा को पूरा जरूर करते हैं। कई वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को देखने के लिए दूर दूर से लोग यहां इकट्ठा होते हैं।

बच्चों को मिट्टी में गाढ़ना: अब आपको एक ऐसी प्रथा के बारे में बताने जा रहे हैं जिसकी कल्पना भी आपको अंदर तक हिला कर रख देगी। दरअसल, उत्तरी कर्नाटक में बच्चों को लेकर एक ऐसी प्रथा प्रचलित है जिसमें सूर्यग्रहण के दिन शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों को गर्दन तक रेत में गाढ़ देते हैं। जब सूर्योदय होता है तब बच्चे को वहां बने गढ्ढे में उतार देते हैं। केवल गर्दन छोड़कर पूरा शरीर गढ्ढे के अंदर होता है। करीब 1 से 6 घंटे तक इस प्रथा को किया जाता है। अभिभावकों का मानना है कि सूर्य ग्रहण से होने वाले नकारात्मक प्रभाव से बचने हेतु यह प्रथा लोगों द्वारा अपनाई जाती है। मिट्टी में बच्चों को गाढ़ने के पीछे तर्क ये है कि ऐसा करने से बच्चे के सारे रोग मिट्टी खींच लेगी और बच्चा रोग मुक्त हो जाएगा। हालांकि कुछ अभिभावक अपने बच्चों का इस प्रथा को करके ठीक होने का दावा भी करते हैं। लेकिन आपकी इस पर क्या राय है हमें जरूर बताएं।