जय श्री राम। दोस्तों, इस दुनिया में 4 युग हुए हैं। पहला सतयुग, फिर त्रेतायुग, उसके बाद द्वापर युग और फिर आया कलयुग जो आज भी चल रहा है। हम आपको बता दें, लाखों वर्षों को मिलाकर एक युग बनता है। बात करें सतयुग की तो इसमें 17 लाख 28 हजार वर्ष थे। त्रेतायुग में 12 लाख 96 हजार वर्ष होते थे। द्वापर युग में करीब 8 लाख 64 हजार वर्ष थे और अब जो ये कलयुग चल रहा है इसकी आयु होगी 4 लाख 32 हजार वर्ष के करीब।

आज हम आपको सतयुग में राम और रावण युद्ध से जुड़े एक किरदार के बारे में बताने जा रहे हैं। रामायण तो आप में से ज़्यादातर लोगों ने पढ़ी ही होगी। अगर नहीं भी पढ़ी होगी तो लाॅकडाउन के दौरान आज की पीढ़ी ने दूरदर्शन पर जरूर रामायण सीरियल को देखा होगा। इसी का एक किरदार है कुंभकरण। दोस्तों, कुंभकरण के बारे में ये तो आप जरूर जानते होंगे कि वह करीब 6 महीनों तक सोता था और एक दिन जागकर फिर से 6 महीनों के लिए सो जाता था।

क्या आप जानते हैं, कुंभकरण के परिवार के बारे में? उसको सोने का वरदान मिलने के पीछे की कहानी? चलिए हम बताते हैं। पहले जानते हैं कुंभकरण के परिवार के बारे में। कुंभकरण के नाम के पीछे भी एक वजह है। कुंभ का मतलब होता है घड़ा और कर्ण मतलब कान। बचपन में ही बड़े घड़े जैसे कान होने के कारण इसका नाम कुंभकरण पड़ा। कुंभकरण के पिता का नाम था ऋषि व्रिश्रवा था और उसकी माता का नाम राक्षसी कैकसी था। वह राक्षस कुल में जन्मा था। कुंभकरण लंका नरेश रावण का छोटा भाई था। यह शूर्पनखा और विभीषण का बड़ा भाई था। कुंभकरण पर अपने पिता का ही प्रभाव था। उसे वेदों का भी ज्ञान था।

कुंभकरण का शरीर इतना बड़ा था दोस्तों कि वह पल भर में किसी को भी अपनी हथेली पर उठा सकता था और चींटी की तरह मसल भी सकता था। आपको ये बात हैरान कर देगी कि उसके सोवकों को उसे खाना देने के लिए सीढ़ी का सहारा लेना पड़ता था। तब कहीं जाकर वे उसके पलंग तक पहुंचते थे। अब आपको बताते हैं कि कुंभकरण की पत्नी कौन थी। कुंभकरण का विवाह विरोचन की पुत्री वज्र ज्वाला के साथ हुआ था। उसकी एक और पत्नी थी जिसका नाम था कर्कटी।

कुंभकरण ने एक पर्वत पर निवास करने वाली महिला से शादी की थी जिससे उसे भीम नामक पुत्र हुआ। अब ये भी जान लीजिए दोस्तों, कि आखिर कुंभकरण को सोने का वरदान कैसे मिला। कहते हैं, जब कुंभकरण का जन्म हुआ तो उसने रावण की प्रजा के बहुत से लोगो को खा लिया था क्योंकि उसे बहुत अधिक भूख लग गई थी। उसके ऐसा करने से सारी प्रजा भय के मारे त्राहीमाम करने लगी। सब मिलकर इंद्र के पास पहुंचे। विचार किया गया कि इसे कैसे रोका जाए। तब इंद्र देव ने कुंभकरण से युद्ध किया।

उस दौरान कुम्भकरण ने इंद्र के सफेद हाथी एहरावत के बाहर निकले नुकीले दांत ,इंद्र के शरीर में चुभा दिए थे। इस कारण उसका पूरा शरीर जलने लगा। इसके बाद इंद्र भी कुंभकरण से भयभीत होने लगे थे। कुंभकरण स्वर्ग पर राज करना चाहता था और उसकी इच्छा थी कि वह इंद्रासन ले ले यानी इंद्र का आसन। उसने ब्रह्म देव से वर मांगने की ठानी। उन्हें प्रसन्न करने के लिए कुंभकरण कड़ी तपस्या करने लगा। उधर देवताओं ने ब्रह्म देव से कहा कि अगर उन्होंने उसे वरदान दे दिया तो अनर्थ हो जाएगा। प्रार्थना की कि कुंभकरण को वरदान न दें।

ब्रह्मदेव ने कहा वरदान तो देना ही पड़ेगा। आप सब सरस्वती मां से मदद मांगिए। कहते हैं 24 घंटे में एक बार सरस्वती हमारी जीभ पर बैठती हैं। उस समय हमारे मुंह से जो भी निकलता है वो सच हो जाता है। ऐसा ही कुम्भकरण के साथ भी हुआ। जब वर मांगने की बारे आई तो ब्रह्मा जी और सभी देवताओं के आग्रह पर सरस्वती माता कुंभकरण की जुबान पर बैठ गईं। तब उन्होंने कुंभकरण के मुंह से इंद्रासन की बजाए निंद्रासन बुलवा दिया।

इसी के फल स्वरूप ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया कि वह सारी जिंदगी बस सोता ही रहेगा। कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा। कुंभकरण की ये हालत रावण से देखी नहीं गई। रावण ने ब्रह्म देव से प्रार्थना करते हुए कहा कि ऐसे तो मेरा भाई केवल मृत शरीर की तरह पड़ा रह जाएगा। जब रावण ने ऐसा कहा तो ब्रह्मा जी ने कुंभकरण को दिए वरदान में बदलाव करते हुए कहा कि अब वह केवल एक दिन जाग सकता है। वह पूरे साल में 6 महीने सोएगा, एक दिन जागेगा और फिर से 6 महीने के लिए सो जाएगा।

कुंभकरण एक वैज्ञानिक भी था। वह एक दिन जागने के दौरान अपनी पत्नी के साथ मिलकर विभिन्न प्रकार के शोधकार्य भी किया करता था। इसका प्रयोग शत्रु सेना को हराने के लिए रावण करता था। कुंभकरण के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत बुद्धिमान था। रावण के पास जो पुष्पक विमान था वह कुंभकरण ने ही बनाया था। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि पुष्पक विमान को विश्वकर्मा ने बनाया था। खैर इस बात पर फिर कभी चर्चा करेंगे।

वैसे दोस्तों, कुंभकरण के अंदर कई हाथियों जितना बल था। सेवक उन्हें खाना खिलाते-खिलाते थक जाते थे लेकिन वह खाते खाते नहीं थकता था। अनुमान है कि कुंभकरण ने शोध के लिए अनजान जगह पर लैब बनई थी। ऐसा माना जाता है कि उसकी प्रयोगशाला किष्किंधा के दक्षिण दिशा में किसी गुफा के अंदर बनी हुई थी। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि रावण जो दव्यास्त्र युद्ध के दौरान प्रयोग करता था उन्हें भी कुंभकरण ने ही बनाया था। कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार कुंभकरण का असली ठिकाना था लैटिन अमेरिका का कोई देश। यहां से आवागमन के लिए वह अपने द्वारा विकसित विमान का इस्तेमाल किया करता था।

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