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नमस्कार दोस्तों। आज हम आपसे बात करने वाले हैं एक ऐसे शख्स के बारे में जिसने अपनी कड़ी मेहनत और लगन के दम पर अपनी गरीबी को हराया। वो लड़का जिसके घर में न तो टीवी था, न ही टेलीफोन और न ही कोई कार। वो आज 281 मिलियन डाॅलर का मालिक है।

अगर आपको कोई जानकारी लेनी होती है तो आप क्या करते हैं? आप या तो अपने बुजुर्गों से पूछते हैं या किसी दोस्त या फिर रिश्तेदार से उस बारे में जानकारी लेते हैं। अगर कोई भी जानकारी न दे सके तो आप कहां जाते हैं? सीधा गूगल बाबा के पास जाते हैं न।

सही कह रहे हैं न हम। आप गूगल पर सर्च करते हैं और 101 परसेंट आपको सही और सटीक जानकारी चुटकियों में मिल जाती है। तो आज हम उसी गूगल के सी ई ओ सुंदर पिचाई के स्ट्रगल के बारे में आपको बताने वाले हैं। एक समय वो भी था जब सुंदर पिचाई फर्श पर सोते थे और आज वो गूगल के सी ई ओ बनकर अर्श पर पहुंच गए हैं। दुनिया के सबसे अमीर लोगों में उनकी भी गिनती होती है।

चलिए आपको इनकी सक्सेस स्टोरी बताते हैं। दोस्तों, सुंदर पिचाई का जन्म 10 जून 1972 में चेन्नई (तब का मद्रास) में हुआ। इनके पिता रघुनाथ जीसीई नामक एक ब्रिटिश कम्पनी में इंजीरियर के पद पर काम करते थे। अगर हम आपको एक ऐसे मकान में रहने के लिए कहें जो शुरू होते ही खत्म हो जाता है यानी कि बहुत छोटा है तो आप निश्चित ही उसमें नहीं रहना चाहेंगे।

लेकिन सुंदर पिचाई एक छोटे से मकान में रहते थे जो दो कमरों का था। सुंदर पिचाई की पढ़ाई के लिए उस घर में अलग से कोई कमरा नहीं था। वो अपने भाई के साथ ड्राइंग रूम में अपने छोटे भाई के साथ सोते थे। न तो उनके पास कोई कार थी और न ही टीवी लेने का ख्वाब वो देख सकते थे। सुंदर पिचाई की आर्थिक हालत बेहद खराब थी। जिस मकान में वो रहते थे उनमें से भी एक रूम पैसे की तंगी के चलते किराए पर दिया हुआ था।

उनके पिता ने उनके मन में बचपन से ही तकनीक का बीज बो दिया था। दोस्तों, वो कहते हैं जहां चाह है वहां राह है। सुंदर पिचाई का हौसला उनके अभाव से कहीं बड़ा था। उनकी माली हालत के बावजूद उन्होंने आईआईटी का एंट्रेंस टेस्ट पास किया और महज़ 17 वर्ष की आयु में ही खड़गपुर के आईआईटी काॅलेज में एडमीशन ले लिया।

सुंदर पिचाई की गिनती अपने अपने काॅलेज के बैच के टाॅपर्समें की जाती थी। वे पढ़ाई में नम्बर वन थे। सुंदर पिचाई अपनी पढ़ाई के दौरान 1989-1993 तक अपने बैच के टाॅपर नाॅन स्टाॅप बने रहे थे। आईआईटी में सुंदर पिचाई के शिक्षक रह चुके प्रोफेसर सनत कुमार राय ने अपने एक इंटरव्यूह में कहा कि ‘‘मेटलर्जिकल एंड मेटेरियल साइंस’’ की वो पढ़ाई कर रहे थे। इस दौरान भी सुंदर पिचाई इलेक्ट्रौनिक की फील्ड में अलग-अलग विषयों पर काम कर रहे थे।

आप को यह जानकर हैरानी होगी दोस्तों कि उस दौरान आईआईटी के सिलेबस में इलेक्ट्राॅनिक्स था ही नहीं। तो भी इस फील्ड के लिए सुंदर पिचाई की दीवानगी गजब की थी। आईआईटी खड़गपुर से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अपने दम पर उन्होंने कैलिफोर्निया के स्टैनफोर्ड में उनका सिलेक्शन हुआ जाॅब के लिए। उन्हें स्काॅलरशिप मिली थी। इसके तहत वहां पर रहने, खाने या अन्य खर्चे स्टैनफोर्ड की तरफ से उठाया जाना था लेकिन एक शर्त थी।

वो शर्त यह थी कि प्लेन के आने जाने का खर्चा सुंदर पिचाई को खुद ही करना था। वहां पर परिवार का कोई एक सदस्य ले जाने की परमीशन थी। सुंदर पिचाई चाहते थे कि वो अपनी मां को वहां लेकर जाएं। पर उनके पिता की तनख्वाह ही 2000 रुपए महीना थी।

सुंदर के पिता ने अपने ऑफिस में बड़ी मिन्नतें करके पूरे साल की सैलरी एक साथ एडवांस ली। इससे भी केवल सुंदर पिचाई की टिकट आई और उनकी मां साथ में नहीं जा पाईं। स्टैनफोर्ड की शर्त थी कि आपको केवल एक बैगपैक लेकर ही आना है।

आप बड़े सूटकेस नहीं ला सकते। उस बैगपैक की कीमत ही 2000 रुपए थी। उनके पिता की सैलरी फिर से इसी में खर्च हो गई। दोस्तों, जरा सोचिए कि जिस सुंदर पिचाई के पिता ने अपनी पूरी एक साल की सैलरी एडवांस लेकर उसे बेचकर सुंदर की एक प्लेन की टिकट खरीदी थी।

आज उसी सुंदर पिचाई की सैलरी इतनी है कि वो अपनी पूरे साल की सैलरी से ऐसे 10 प्लेन यूं ही खरीद सकते हैं। कामयाब लोगों की एक खासियत होती हैै। वो कभी भी किसी भी मौके को हाथ से जाने नहीं देते हैं। यही सुंदर पिचाई ने भी किया।

सुंदर पिचाई का कहना है कि ‘‘ऑपर्चुनिटी डोन्ट हैपेन, यू क्रिएट देम’’। मशीन और तकनीक से सुंदर को बहुत लगाव था। टेलीफोन, स्कूटर और टीवी ये तीन ऐसी चीज़ें थीं दोस्तों जिसने उनकी ज़िंदगी बदल दी। उन्हें अपने घर में टेलिफोन लगवाने के लिए करीब 5 वर्ष इंतजार करना पड़ा। सुंदर के पिता फोन करने के लिए बहुत दूर जाते थे और वहां ट्रंक काॅल करते थे।

आधा घंटा जाने में, आधा घंटा अपनी बारी का वेट करने और फिर आधा घंटा वापस आने में उनका वेस्ट हो जाता था। जब घर में टेलिफोन लगा तो उनके पिता का यह समय बच सका। इसी तरह जब मां फल और सब्जी लेकर बाहर जाती थी और आती थी तो इसमें उनका पूरा दिन लग जाता था।

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क्योंकि फ्रिज नहीं था इसलिए उतना ही लाती थीं जितना एक बार में यूज़ हो जाए और खराब न हो। एक समय का खाना बनाने के बाद वो फिर से बाजार जाकर सब्जी लेकर आती थीं और फिर से रसोई में खाना बनाती थी। फ्रिज के आ जाने से उनकी मां का समय बचा और वो अपने बच्चों को टाइम दे पाईं। जब घर में स्कूटर आया तो पिता बच्चों को टाइम दे पाए और उन्हें कहीं घुमाने के लिए ले कर जाने लगे। तब सुंदर पिचाई को एक बात समझ आई। उन्होंने देखा कि मशीनों से हमारा टाइम बहुत बचता है।

एक बार की बात है। उनका प्रेम मशीनों के प्रति इतना था कि उन्होंने अपने लैंडलाइन जो कि बहुत मुश्किल से उनके घर में लगा था उसे भी खोल दिया। हांलांकि बाद में जब वो उसे बंद नहीं कर पाए तो उनके पिता से उन्हें मार भी खानी पड़ी। लेकिन फिर पिता ने सोचा ये बहुत यूनीक है।

ये दुनिया से कुछ अलग हट कर करेगा। जब वो चेन्नई से अमेरिका जाने वाले थे तो आईआईटी खड़गपुर में गए। यहां पर उन्होंने किसी को गाली देते हुए बात करते दूसरे व्यक्ति से सुना तो उन्हें लगा कि यह बहुत अच्छा शब्द है। उन्होंने अपने से 4 साल सीनियर के साथ उसी लहेजे में बात की ये सोचकर कि उन्हें अच्छा लगेगा। लेकिन गाली भला किसको अच्छी लगती है। उस सीनियर ने सुंदर पिचाई की पिटाई कर दी। तब उन्होंने किसी से पूछा तो पता चला यह गाली का शब्द है शाबाशी का नहीं।

इस घटना से उनके भोलेपन का पता चलता है। सुंदर पढ़ाई के साथ साथ क्रिकेट में भी नंबर वन थे। गूगल कम्पनी में काम करने से पहले सुंदर एक कंसलटेंसी कम्पनी में कम समय के लिए काम कर चुके थे। माइक्रोसाॅफ्ट सुंदर के काम से काफी ज़्यादा इम्प्रेस हुई और सुंदर पिचाई को अपनी कंपनी का सीईआई बनाने का ऑफर दिया। उस समय वो गूगल में काम करते थे। सुंदर पिचाई ने गूगल में अपने बाॅस को कहा कि वो माईक्रोसाॅफट जा रहे हैं सीईओ बनकर।

बाॅस ने सोचा ये धमकी दे रहे हैं। इनके बारे में सर्वे करने का मन बनाया। सर्वे में 99.9 परसेंट लोगों ने कहा कि अगर सुंदर पिचाई नहीं होंगे तो गूगल कम्पनी नहीं चलेगी यह डूब जाएगी। बस फिर क्या था, गूगल ने उन्हेें 2014 में गूगल का सीईओ बनाया।

इतना ही नहीं, उन्हें तुरंत ही 50 मिलियन डाॅलर का चेक बोनस के तौर पर भी दिया। उनकी सैलरी हाईक हुई साथ ही कम्पनी के शेयर्स भी मिल गए। सुंदर पिचाई का कहना था कि वो जितनी बार रिजाइन करते थे कम्पनी उन्हें प्रोमोट कर देती थी, इसीलिए वो कभी भी गूगल छोड़ ही नहीं पाए। लेकिन दोस्तों, आप यह बिलकुल न दोहराएं। वो गूगल के सीईओ हैं। वो गूगल के लिए काम करते हैं और हम गूगल पर काम करते हैं। इस लेवल तक पहुंचने के लिए हमें कठिन संघर्ष से गुजरना पड़ेगा।

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